गुरुदेव संत पथिक जी महाराज

संत पथिक जी बीसवीं सदी के अग्रगण्य संत रहे हैं। जिनका जीवन ही अपने आप में सनातन दर्शन है। गुरुदेव ने जिस तरह बिना शैक्षणिक ज्ञान के परिष्कृत शुद्ध हिंदी में भी हृदयस्पर्शी, मार्मिक और भक्ति भाव से पूर्ण भजनों की श्रृंखला की रचना और गायन द्वारा लोगों को ज्ञानोपदेश दिया है। केवल आत्मज्ञान और साधना के आधार पर उसका कोई दूसरा उदाहरण वर्तमान भक्ति जगत में उपलब्ध नहीं है। साथ ही उर्दू, पंजाबी भाषा में भी भजनों की रचना और व कवित्व के माध्यम से काफी हृदयस्पर्शी वाणी का सृजन करते रहे।

 गुरुदेव ने अपने भजन में भी लिखा है “ठहर न सकता एक जगह पर इसीलिए तो पथिक नाम है। पथिक नाम को सार्थक करते हुए गुरुदेव ने कोई आश्रम या कुटिया का निर्माण अपने जीवनकाल में नहीं किया। भारत के तीर्थों में अधिकतर आपका निवास रहा करता था और संपूर्ण भारत अर्थात दक्षिण- पूर्व- पश्चिम देश की सभी दिशाओं मे जन-जागरण के लिए विचरण करते रहते थे। प्रायः उस समय भारत के सब सन्त इनके मित्र रहे, तथा ज्ञान एवं त्याग के प्रशंसक रहे।

जीवन चरित्र

गुरुदेव संत पथिक जी का जन्म संवत्‌ १९३५ में जिला फतेहपुर ग्राम बकेवर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। आपका बचपन ग्राम साढ़, जिला कानपुर (उत्तर प्रदेश) में बीता। आपके पिता ने आपका नाम गया प्रसाद त्रिवेदी रखा था परन्तु आप ब्रह्मचारी के नाम से ही प्रसिद्ध रहे। गुरु महाराज ने आपका नाम ‘पलकनिधि’ रखा था। बचपन से ही आपकी रुचि इस लोक से अधिक अलौकिक जगत में जागृत हो चुकी थी और आत्मा-परमात्मा, इहलोक-परलोक, सृष्टि के विभिन्न रहस्यों को जानने की लालसा में आप स्थान – स्थान पर घूमते विचरते और तप करते रहे। आपकी खोज पूरी हुई तब जब आपको गुरु के रूप में नागा बाबा मिले। उनके मार्गदर्शन में रहते हुए आपने मानव-सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानने का व्रत लिया और फिर विभिन्न विद्यालयों का निर्माण कराया। 

विद्यालय निर्माण के पीछे भी सनातन शिक्षा व साधना का रहस्य था। संत पथिक जी के बहुत से भक्त ज्ञान- साधना से प्रभावित होकर नश्वर संसार मुक्ति के लिए सन्यास ले रहे थे। गुरुदेव का उपदेश था, कि गृहस्थ जीवन में सन्यासी की तरह रहो, घर छोड़ने या गेरुआ कपडे पहनने से वैराग्य नहीं आएगा। मेरा कोई है नहीं, इसलिए हम वीतरागी सन्यासी हैं। तुम जिम्मेदारी छोड़कर ना भागो। खुद कमाकर खाओ, दानदाताओं के आश्रित होकर साधना नहीं हो पाती। किंतु कालांतर में कुछ ऐसे भक्तों ने आश्रम के लिए भूमि खरीद ली।

विद्यालय निर्माण का रहस्य

तब गुरूजी ने वहाँ चैरिटेबल स्कूल बनाने का आदेश दिया, उन सभी सन्यास की इच्छा रखने वाले शिष्यों शिक्षा और क्षमता अनुसार पढ़ाने और सहायक कार्यों को साधना की तरह (कर्म सन्यास) करने का आदेश दिया। साथ ही बचे समय में कठिन साधना- ध्यान की विधियों का मुक्ति लाभ हेतु प्रशिक्षण दिया। ऐसी ही भावना से विद्यालयों का निर्माण हुआ।

स्वामी संत पथिक जी के पास पूर्व में भी जब लोग जबरदस्ती दान करने आते तो कहते “मैं तुम्हारे पैसे का क्या करूंगा? मुझको दो लंगोट, एक धोती और एक मुट्ठी अनाज तो अपने भजन- प्रवचन की किताब की रॉयलिटी से मिल जाता है।” भारत माता मंदिर के संस्थापक परमादरणीय सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज बताते थे, कि कभी हम हिम्मत करके विदेश से लाया वस्त्र- कंबल, शाल आदि देते, तो प्रेमपूर्वक थोड़ी देर धारण करके किसी को आशीर्वाद, दान- उपहार में दे देते। जब लोग अधिक आग्रह करते तो उनको सरकारी स्कूलों की मरम्मत और विद्यार्थियों के बैठने – पढ़ने के लिए सामान और पानी आदि आवश्यक व्यवस्था करने को कहते। अथवा सरकारी और चैरिटेबल अस्पतालों में चिकित्सा उपकरणों, सहायक उपकरणों, दवाइयाँ और बेड आदि की व्यवस्था करने को कहते।

शास्त्रोक्त दान का आदेश

स्वामी जी सभी भक्तों को अपनी कमाई से आसपास जरूरतमंदों के लिए पढाई- दवाई- रोजगार की व्यवस्था करने को कहते। उनका उपदेश था कि पढ़ा- लिखा बच्चा अपने परिवार का भविष्य खुद संवार देगा, अतः जरुरत मंद को पढ़ाना सबसे बड़ी मेरी सेवा है। लड़कियों को अवश्य पढ़ाओ, जरुरत पड़ने पर असहाय नहीं रहेंगी और अपनी संतान को भी पढ़ा सकेंगी। भंडारा दिखावा है, किसी को कितने दिन खिला दोगे, हाँ भूखे को अपने दरवाजे से खिला-पिलाकर भेजो, नहीं तो अपराध होगा, और तुम्हारा पुण्य नष्ट होगा।

संत पथिक जी महाराज युवावस्था से ही त्यागस्वरूप रहे, अपने शरीर के प्रति अत्यन्त कठोर रुख अपनाते हुए कष्ट सहने के लिये इसे तैयार करते रहे। टाट का अंचला, लंगोटी, बिछाने – ओढने के लिये भी टाट का प्रयोग करना, भोजन के नाम पर चना और गेहूं को अंकुरित करके ग्रहण कर लेना – इस प्रकार का तपस्यापूर्ण जीवन जीते – जीते आप सदैव अपने शिष्यों को भी त्याग और अपेक्षारहित तप करने की शिक्षा देते रहे। वह हमेशा यही समझाते रहे – “बेटा, बर्दाश्त करना ही सिद्धि है। जिसको संसार में सहन करना आ गया वही सच्चा और अच्छा साधु होता है। ऐसा साधु ही प्रभु प्रदत्त मनुष्य जीवन का रहस्य प्राप्त करके दुष्टों को भी सन्त और साधु बना पाता है। सहन करे सो साधु – बस सहते चलो और भले और भलाई के काम करते चलो। मान-अपमान, सुख-दुःख, लाभ-हानि, ये सब तन और मन की परिस्थितियां हैं। अनुभव करते रहें कि मैं शरीर नहीं, मैं मन नहीं वरन् मैं शुद्ध-बुद्ध-मुक्त सच्चिदानन्दघन अद्वितीय परमात्मा से एक हूं। ऐसा निश्चय करके, प्रतिकूल परिस्थितियों से अपने को निकाल लें।

महासमाधि

गुरुदेव अपना अधिकांश समय ज्ञान-दान हेतु भ्रमण में ही व्यतीत करते थे। आपने अठसराय में नागा निरंकारी विद्यालय बनवाया। जिला कानपुर ग्राम साढ़ में भी आपने विद्यालय बनवाया है। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी, तदनुसार १० जून १९९७ को परमार्थ आश्रम, हरिद्वार में आपका शरीर पूर्ण होकर परमब्रह्म में लीन हुआ। वहीं स्वामी चिन्मयानन्द जी के मार्गदर्शन में (स्वामी चिन्मयानंद जी ने कहा कि “हमारे गुरूजी भी स्वामी जी के प्रति बहुत श्रद्धा रखते थे। स्वामी पथिक जी महाराज ने जब यहाँ अपने को ब्रह्मलीन किया है, तो समाधि मंदिर यहीं बनेगा, अन्यत्र नहीं) तत्पश्चात आदरणीय संत आसाराम बापू जी ने गुरुदेव को वहीं भू-समाधि अपने हाथों से दी। उसी स्थान पर परमार्थ आश्रम हरिद्वार में भव्य संत पथिक समाधि मंदिर बना हुआ है।

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